शुक्रवार, 8 मई 2026

गीता समागम अध्याय 4 श्लोक 36

यदि सब पापियों से अधिक पापी तुम अपने आप को समझ पाओ तो ज्ञान रूपी देने पर सवार होकर पाप समुद्र से पार हो जाओगे

देख खुद को गौर से
 कपट भीतर कितना
 यही ज्ञान मुक्ति दे 
 मुक्ति माने देखना 

शनिवार, 24 अगस्त 2024

अध्याय 4 श्लोक 38श्लोक_

श्रीमद्भगवद्गीता_(१९:०८:२०२४)19 अगस्त 2024
अध्याय 4 श्लोक  38श्लोक_
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ।
तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति तथा।। अर्थ –
ज्ञान के समान पवित्र करने वाला इस लोक में और कुछ नहीं है। योग में सिद्ध पुरुष समय आने पर यह ज्ञान अपने आत्म में स्वयं ही अनुभव करते हैं।काव्यात्मक अर्थ –
काल को देखो अहम को जानो
अवलोकन ही आत्मस्नान है
मल मान्यता मिथ्या धारणा
शुद्ध करता ‘बस’ आत्मज्ञान है।
 
वास्तव में श्लोक का सही अर्थ _
➡️मात्र आत्मज्ञान ही पवित्र कर सकता है, उसके अलावा और कुछ नहीं। योग में सिद्ध पुरुष काल (दृश्य-दृष्टा , प्रकृति, अहंकार) के अवलोकन से सतत बोध में रहता है, ध्यानस्थ रहता है।
# दो सूत्र है_ दोनों ही हमारी धारणाओं को ध्वंस करने वाले है।
१) न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते: 
२) कालेनात्मनि विन्दति: # श्लोक की दोनों बातों को हमने गलत समझा है,अपने अनुसार समझा है तो गलत ही होगा।# योगी समय आने पर आत्मज्ञान का अनुभव करता है , यही प्रचलित अर्थ है इन पंक्तियों का।
## अलग अलग केंद्र से अर्थ निकलता है_
१_लोक धर्मवाला अर्थ निकलता है।
२_कृष्ण धर्म वाला अर्थ निकलता है# अहम जहां से कृष्ण को देखेगा, तो कृष्ण के ऊपर स्वयं की छाया ही पड़ती है और कहता है, हे कृष्ण,अरे कृष्ण!कृष्ण के नाम पर अपनी छबि को देखता है,
अपनी प्रक्षेपित छबि को ही देखता है।हम जैसे होते है वैसे ही भगवान को मानते है और उनके उसी रूप की पूजा करते है,जिसे हम प्रेम का नाम देते है,कृष्ण का नाम देते है
 नाम, सामान्न दे रहे होते है, नाम होता है कृष्ण का पर स्वयं का ही आदर होता है अपनी मान्यतों का, अपनी कल्पनाओं का।## कालेनात्मनि विन्दति: _
*विन्दति:_ विद् धातु से आया है,वेद से आया है, विद माने बोध, जानना, अनुभव करना नहीं है।## विन्दंति:_माने  अनुभव करना ऐसी गलत फहमी है,अनुभव का केंद्र अहंकार होता है।# अहम् जब विगलित होने लगता है, तब होता है जानना, बोध होता है तब।# अहम् केंद्र में होता है तब अनुभव होता है, बोध नहीं। तो अहम् कहता है, अनुभव ही तो बोध है।अहम् अगर केंद्र में है, तो बोध हो ही नहीं सकता। 
 # अहम तो अनुभोक्ता है, तो बोध नहीं, सिर्फ़ अनुभव होता है।
 # आत्मा_अहम की न्यूनतम अवस्था ही आत्मा कहलाती है।आत्मा अगर केंद्र में है तो बोध होगा।
 # अहम् कहता है, मेरे रहते भी बोध हो जाएगा। इसलिए, अनुभव = बोध। यही कारण है कि लोकधर्म में अनुभव को बड़ा समान्न दिया जाता है।## क्या तुम्हे ईश्वर  का अनुभव हुआ है?
*झूठ है, तो उसका अनुभव हो जाएगा। सत्य का अनुभव लेने के लिए कौन बचा रहेगा,अनुभव लेने के लिए कोई होना तो चाहिए न।
 
## सत्य तो अद्वैत है। यदि सत्य है, तो और कुछ नहीं है।अगर सत्य है और हम भी है,तो दोनों झूठ है। जो परमात्मा के अनुभव के अनुभव की बात करे ,वो पाखंडी है।
 ## सब अनुभव द्वैतात्माक होता है, क्योंकिहमारे सभी अनुभवों जेबकेंद्र में अहंकार बैठा होता है।
##  ये भारी घोर अज्ञान की बात है कि हम कृष्ण के पास जाना चाहते है अपनी धारणाओं को बचाए बचाए।
# हम अपनी ही धारणाओं को सत्य के ऊपर ओढ़ देते है।अहंकार ही माया है।मूल माया अहम वृत्ति है।## कालेनात्मनि विन्दति_
कालेंन_"सही समय आने पर" माने कोई रचियता है जिसके आने पर आत्मा कानुभाव हो जायेगा। है। जो योगसिद्ध व्यक्ति होता है उसको आत्मा का अनुभव होता है।
# आत्म से आशय है अहम् । विन्दति = जानना (अनुभव नहीं)
## जानना,बोध होना और अनुभव करना दोनों अलग है।
# अनुभव झूठ है क्योंकि अनुभव का अनुभोक्ता अहम है,वो भी झूठा है।# शान्ति कोई विशेष अनुभव नहीं होती , सब अनुभवों के बीच में भी अगर आप स्थिर है, तो वो शांति।# अगर शांति का अनुभव हो रहा है, तो वह अशांति है। सत्य का अनुभव है, तो असत्य। प्रेम का अनुभव हो रहा है, तो प्रेम नहीं है। जो मुझे हो रहा है, वह सब झूठ ही होगा।जिसका भी हमको अनुभव हो गया, वह झूठ हुआ क्योंकि हमको अनुभव हुआ।# कालेन_काल = प्रकृति। काल के माध्यम से आत्म (अहम् ) को जाना जाता है।
# एक एक बीते पल को जानना यही वेद है।
 जो काल के माध्यम से स्वयं को जानने लग गया है वो है विन्दति। यही बोध की धारा है।
💥निरंतर अवलोकन से निरंतर ज्ञान।ज्ञान कोई पूर्ण विराम नहीं होता कि हो गया।ज्ञान एक सतत प्रवाह है।
💥काल के द्वारा जो वेद या जानना होता है वह भी लगातार होगा। काल बाहर भी है, काल भीतर भी है।
💥काल को जानना माने उसको जानना जो लगातार बदल रहा है ,अहम के दो छोर है दृश्य और दृष्टा।जिसने दृश्य और दृष्टा  को जान लिया उसने अहम को जान लिया, उसे बोध हो गया।
💥 जीवन एक बोध यात्रा है। सतत धार है।समय इसीलिए मिला है की जीवन को जानते रहा जय।
💥 जो जीवन काल में ही जीवन को जानते रहता है,जो कहे जीवन जानने के लिए है, वह जीवन मुक्त है।
💥जो जीवन को भोगने के लिए जीता है, वह भुक्ता है।
💥मुक्ति क्यों नहीं मिल रही है?_
*क्योंकि हम अपनी कल्पनाओं और छाबियों को कृष्ण का नाम दे रहे हैं। हम जिनकी भक्ति कर रहें है वो कृष्ण है ही नही, हम ग़लत कृष्ण को पकड़े हुए है।" न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते: "
💥ज्ञान माने आत्मज्ञान, आत्मज्ञान के समान पवित्र करने वाला दूसरा कुछ नहीं है। मात्र आत्मज्ञान ही वो अग्नि है जिसमे सब मान्यताएँ और धारणाएँ भस्म होती है।
💥आत्मज्ञान ही पवित्रता है, आत्मअज्ञान ही अपवित्रता है।
💥अवलोकन ही आत्मस्नान है।शुद्ध करता बस आत्मज्ञान है।
💥 हमे केंद्र का पता नही इसीलिए किसकी भक्ति कर रहे है ये भी पता नही।
*अपने भीतर देखने जैसी कोई बात ही नही है।
💥संत कबीर भजे है राम राम राम पर गाते है राम निरंजन न्यारा रे।
💥वो परमभक्त भी है वो महाज्ञानी भी हैं।
💥भक्ति को भी ज्ञान की आग से गुजरना पड़ता है, ताकि उसका सब कूड़ा कचरा भस्म हो जाये।
💥भारत में धर्म का अर्थ होता है भक्ति।
*इसीलिए आज का श्लोक का रहा है_
💥जहां चलनेवाले का पता नही तो क्या करेगा रास्ते पर,गिरेगा या उलटेगा।तीन तल _
💥भुक्ति_सबसे निचला तल_(९९५/१०००)
मेरी धारणा ही सत्य है , यही तो है,मिल गया और भोगो इसको।
*मेरी कल्पना का तल।
💥 युक्ति_युक्ति का तल_(४/१०००)
*ये तथ्य का तल है। ये व्यावहारिक तल है।हम फंसे हुए महसूस करते है ,निकलना चाहते है।
💥मुक्ति_मुक्ति का तल_(१/१०००)
इसमें 1 %लोग होते है।
पारमार्थिक तल।
💥योग का वास्तविक अर्थ_अहम का आत्मा से मिलन।
💥भुक्ति के तल से युक्ति के तल पे जाओ पहले।
💥योगी वह जो जान गया है कि मिलन नहीं हुआ है, और प्रयास करता है। 
*मिलन का प्रयास करे वो योगी।
💥जिसका योग सिद्ध हो गया, जो युक्त ही हो गया, वो है मुक्त।
💥योग सिद्ध होना भी एक सतत् प्रक्रिया है।
💥योग सिद्ध माने मुक्त_ जो निरंतर योग की दिशा में बढ़ रहा है। अंतिम बिंदु नहीं है सिद्धि, सतत प्रेम है सिद्धि। आज़ादी मुक़ाम नहीं, मिल नहीं जाती, लगातार चाही जाती है।
💥जहां चलने वाले का ही पता नहीं, तो वह रास्ता कहाँ तक जाएगा। ‘मैं' किसी मार्ग में है नहीं है, तो वह मार्ग किसी काम का नहीं है।
💥काल माने काम। कामना कहती कहीं कुछ बदले, काल कुछ बदलता है। 
💥कालेन = कामेन ,एक ही बात है।
💥काल मानें परिवर्तन, दृश्य-दृष्टा दोनों परिवर्तित होते है।
💥कामना माने विषय के प्रति जो बदलता है।
💥काल या काम विषय के और ख़ुद के बारें में पता नहीं होने देता।
💥काल और काम, माया के ही है दो नाम।
💥ज्ञान की विधि _काल और काम का अवलोकन।
💥देखना है बदलती दुनिया को और हमारे बदलते रूप को।
💥तीसरा कोई है निहित, निरपेक्ष, इसी साक्षीत्व को जानने के विज्ञान को अध्यात्म कहते है।
💥दृष्टा रहेंगे तो चैन पाएंगे नहीं। दृष्टा का चैन दृश्य से बंधा हुआ होता है।
💥साक्षित्व में ही शांति है।
💥ज्ञान का सूत्र - 
*ये जो कुछ भी चारों तरफ हो रहा है ये सब पहले भी कई बार हो चुका है।
💥जो ख़ुद को देखेगा उसे सब याद आ जाएगा। हम देखते नहीं भीतर, इसलिए पहले भी हुआ है यह याद नहीं आता।
💥सारा अतीत ठीक अभी इसी क्षण हमारे सामने है।
💥अभी देख लो क्या हो रहा है, यही अतीत है। 
💥 बंटा हुआ मन हमको कहीं जा नही छोड़ेगा

गुरुवार, 22 अगस्त 2024

गीता समागम

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे॥असली साधु को रक्षा की जरूरत नही होती हैं
वह पहले तुम्हे सही ज्ञान देता है, तुम्हे तुम्हारी वास्तविक शक्ति का बोध कराता है, कुल मिलाकर वह तुम्हारी नजरो मे अच्छा व्यक्ति बन जाता है, फिर वह आयोजन करता है की तुम्हारे सामने किसी बुरे/दुष्ट व्यक्ति से मार खाये या अपमान झेले और जब तुम उसे मार खाते हुए या अपमान सहते हुए देखते हो तो तुम अपनी मान्यताओ/बंधनों/नीतिओ को तोड़ कर उसकी रक्षा करते हो और दुष्ट का विनाश करते हो अर्थात् जब जब तुम धर्म की हानि होते हुए देखते हो और धर्म की रक्षा के लिए अपने बंधनों को तोड़ते हो तो तुम्हारे ही भीतर से सत्य/कृष्णतव् पैदा होता है